कांग्रेस जिलाध्यक्ष उमरिया का विरोध हुआ डमी साबित

कांग्रेस की ज़िला राजनीति में पिछले कुछ दिनों से नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। मंगलवार को नवांगत कांग्रेस ... .

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कांग्रेस की ज़िला राजनीति में पिछले कुछ दिनों से नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। मंगलवार को नवांगत कांग्रेस ज़िला अध्यक्ष इंजीनियर विजय कोल पाली पहुंचे और यहां बगवात करने वाले छत्रपाल सिंह तथा बिंदे सिंह से मुलाक़ात की। तीनों नेताओं ने साथ बैठकर संगठन को मजबूत करने के मुद्दे पर बातचीत की। दिल्ली से हाल ही में प्रशिक्षण लेकर लौटे विजय कोल लगातार उन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे हैं जो किसी न किसी वजह से पार्टी से दूरी बनाए हुए थे।

गौर करने वाली बात यह है कि जब आलाकमान ने विजय कोल को ज़िला अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी तभी इन्हीं दो आदिवासी नेताओं बिंदे सिंह और छत्रपाल सिंह ने खुले तौर पर नाराज़गी जताई थी। ऐसे में उनका विजय कोल के साथ आमने-सामने बैठना संगठनात्मक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। दिल्ली में हुए प्रशिक्षण सत्र में भी प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने स्पष्ट कहा था कि हर नव-नियुक्त अध्यक्ष का पहला कर्तव्य यही है कि वे हर कार्यकर्ता और हर पदाधिकारी को साथ लेकर चलें चाहे वह असंतुष्ट ही क्यों न हो। यही कारण है कि विजय कोल की यह पहल आलाकमान की मंशा के अनुरूप और संगठन को ज़मीनी स्तर पर सक्रिय करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

दूसरी ओर बिंदे सिंह की राजनीतिक यात्रा बार-बार सवालों के घेरे में रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने डमी उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया था। उससे पहले भी वे कई बार स्थानीय चुनावी मैदान में उतरे लेकिन हर बार हार का सामना करना पड़ा। यह लगातार पराजय उनके नेतृत्व और लोकप्रियता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती रही है।

बिंदे सिंह को लेकर क्षेत्रीय युवाओं में असंतोष की एक बड़ी वजह उनके द्वारा एक से अधिक राशन दुकानों का संचालन करना है। स्थानीय युवाओं का आरोप है कि अगर यही दुकानों का संचालन उन्हें दिया जाता तो वे न केवल आत्मनिर्भर बनते बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ते। लेकिन बिंदे सिंह ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कई दुकानों का संचालन अपने हाथ में ले लिया। इसका असर सीधे-सीधे राशन वितरण की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर पड़ा। यही कारण है कि आदिवासी समाज का हिस्सा होते हुए भी बिंदे सिंह को आदिवासियों के शोषक के रूप में देखा जाने लगा।

जिस समय बिंदे सिंह और छत्रपाल सिंह ने विजय कोल की नियुक्ति पर विरोध का झंडा बुलंद किया था उस समय ऐसा लगा कि ज़िले की कांग्रेस इकाई में गहरी दरार पड़ जाएगी। लेकिन राजनीति में समीकरण पलटने में देर नहीं लगती। संगठन की नीतियां और नेताओं का दबाव अंततः काम आया और अब वही बिंदे सिंह जो विरोध की मशाल जलाने में आगे थे हालात देखते हुए पीछे हट गए।

बिंदे सिंह के लिए यह बगावत किसी मायने में फायदेमंद साबित नहीं हुई। बल्कि संगठन के भीतर उनकी स्थिति और कमजोर हो गई। कार्यकर्ताओं के बीच पहले से ही उनकी छवि डगमगाई हुई थी और अब जब उन्होंने अपने ही विरोध को दबाकर ज़िला अध्यक्ष के साथ बैठकर मेलजोल बढ़ाने की कोशिश की तो कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि बिंदे सिंह मजबूरी में कदम पीछे खींच रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिंदे सिंह ने बार-बार डमी उम्मीदवार बनने और व्यक्तिगत स्वार्थों को प्राथमिकता देने की जो आदत डाली उसने उनके भविष्य पर नकारात्मक असर डाला है। आदिवासी समुदाय से आने के बावजूद यदि कोई नेता समुदाय की अपेक्षाओं को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ़ निजी लाभ पर ध्यान केंद्रित करे तो देर-सबेर उसे इसका खामियाजा उठाना ही पड़ता है। यही स्थिति आज बिंदे सिंह के साथ दिखाई दे रही है।

कांग्रेस संगठन की ओर से साफ संकेत है कि अब हर स्तर पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को महत्व दिया जाएगा। विजय कोल की शैली भी यही दर्शाती है कि वे छोटे-बड़े सभी पदाधिकारियों से लगातार संवाद बना रहे हैं। यह न केवल उनकी स्वीकार्यता बढ़ा रहा है बल्कि असंतुष्ट नेताओं को भी मजबूर कर रहा है कि वे संगठनात्मक एकता के नाम पर अपनी आपत्तियां छोड़ दें।

हालांकि माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव की तरह यह विरोध भी सिर्फ दिखावा था। बिंदे सिंह की राजनीति अब असली कम और नकली ज्यादा लगने लगी है। कभी चुनाव में डमी उम्मीदवार बनकर खड़े होना तो कभी संगठन के फैसलों के खिलाफ डमी विरोध करना, यह उनकी पहचान बन गया है। लोग अब मजाक में कहते हैं कि बिंदे सिंह को असली नेता नहीं बल्कि ट्रायल पीस माना जाए जिनकी मौजूदगी सिर्फ शोर मचाने तक सीमित रहती है। विरोध हो या समर्थन, आखिरकार उनका रोल बस इतना ही होता है कि थोड़ी देर बाद चुपचाप मंच से हट जाना।

अंततः यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस से की गई बगावत बिंदे सिंह को महंगी पड़ गई। विरोध की राजनीति में उन्होंने अपनी साख और जनाधार दोनों खो दिए। यही वजह रही कि अंततः उन्होंने अपने ही विरोध को निगलते हुए मीठा खाकर समझौते का रास्ता चुना। लेकिन उनकी यह वापसी कितनी टिकाऊ होगी यह आने वाला समय ही तय करेगा।

Sanjay Vishwakarma

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